“जब जीवन में सब कुछ अच्छा हो, तब ईश्वर पर विश्वास आसान होता है।
असली प्रश्न तब उठता है, जब आँखों में आँसू हों और फिर भी हम आकाश की ओर देखकर पूछें—’क्या तुम अब भी मेरे साथ हो?’”
क्या बुराई का अस्तित्व ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देता है?
(The Problem of Evil : एक दार्शनिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टिकोण)
“जब जीवन में सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब ईश्वर पर विश्वास करना आसान होता है। लेकिन जब किसी माँ की गोद उजड़ जाती है, किसी मासूम बच्चे को कैंसर हो जाता है, या किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय होता है, तब एक प्रश्न मन को झकझोर देता है—यदि ईश्वर है, तो यह सब क्यों?”
यही प्रश्न दर्शनशास्त्र में “Problem of Evil” कहलाता है।
यह केवल एक दार्शनिक तर्क नहीं है। यह हर उस व्यक्ति का प्रश्न है जिसने कभी जीवन में गहरा दुःख देखा है।
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एक छोटी सी कहानी
एक गाँव में एक साधु रहते थे।
एक दिन एक युवक उनके पास आया और बोला—
“महाराज, आप कहते हैं कि ईश्वर दयालु है। लेकिन पिछले महीने बाढ़ में मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई। मेरा छोटा भाई भी बह गया। यदि ईश्वर दयालु है, तो उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
साधु कुछ क्षण मौन रहे।
फिर बोले—
“बेटा, मैं तेरे दुःख का उत्तर नहीं दे सकता। लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि मनुष्य के हर प्रश्न का उत्तर उसके दुःख के समाप्त होने से नहीं मिलता। कई बार उत्तर उस शक्ति में मिलता है जो दुःख के बाद भी उसे जीवित रखती है।”
युवक चुप हो गया।
क्योंकि कभी-कभी प्रश्न का उत्तर शब्द नहीं, अनुभव देता है।
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आखिर Problem of Evil है क्या?
यह तर्क कहता है—
यदि ईश्वर:
– सर्वशक्तिमान है (सब कुछ कर सकता है)
– सर्वज्ञ है (सब कुछ जानता है)
– सर्वदयालु है (सबसे प्रेम करता है)
तो फिर संसार में:
– युद्ध क्यों हैं?
– बीमारी क्यों है?
– अन्याय क्यों है?
– प्राकृतिक आपदाएँ क्यों हैं?
– निर्दोष लोग दुःख क्यों सहते हैं?
यदि ईश्वर बुराई को रोक सकता है और फिर भी नहीं रोकता, तो क्या वह दयालु है?
और यदि वह रोकना चाहता है लेकिन रोक नहीं सकता, तो क्या वह सर्वशक्तिमान है?
यही इस तर्क का मूल है।
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कुछ ऐसे उदाहरण जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं
1. एक मासूम बच्चा
कल्पना कीजिए—
एक पाँच साल का बच्चा कैंसर से पीड़ित है।
उसने किसी का बुरा नहीं किया।
फिर भी वह असहनीय दर्द झेल रहा है।
कई लोग पूछते हैं—
“इसमें उस बच्चे की क्या गलती थी?”
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2. प्राकृतिक आपदाएँ
भूकंप, सुनामी, बाढ़, जंगल की आग।
इनमें हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं।
क्या यह ईश्वर की इच्छा है?
या प्रकृति का नियम?
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3. युद्ध और हिंसा
इतिहास गवाह है कि लाखों लोग युद्धों में मारे गए।
क्या ईश्वर यह सब देखता है?
यदि हाँ, तो रोकता क्यों नहीं?
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नास्तिक दृष्टिकोण
कई दार्शनिकों ने कहा—
“यदि संसार में इतनी बुराई है, तो या तो ईश्वर नहीं है, या फिर वह वैसा नहीं है जैसा धर्म बताते हैं।”
प्रसिद्ध दार्शनिक Epicurus ने प्रश्न उठाया—
«”क्या ईश्वर बुराई को रोकना चाहता है लेकिन रोक नहीं सकता?
तो वह सर्वशक्तिमान नहीं।
क्या वह रोक सकता है लेकिन रोकना नहीं चाहता?
तो वह दयालु नहीं।
क्या वह न रोक सकता है और न रोकना चाहता है?
तो फिर उसे ईश्वर क्यों कहें?”»
यह तर्क आज भी दर्शनशास्त्र में चर्चा का विषय है।
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आस्तिकों का उत्तर : स्वतंत्र इच्छा (Free Will)
आस्तिक विचारक कहते हैं—
ईश्वर ने मनुष्य को रोबोट नहीं बनाया।
उसने उसे चुनाव करने की स्वतंत्रता दी।
और जहाँ स्वतंत्रता होगी, वहाँ गलत निर्णय लेने की संभावना भी होगी।
उदाहरण:
एक व्यक्ति दान कर सकता है।
वही व्यक्ति चोरी भी कर सकता है।
यदि ईश्वर हर बुरे कार्य को होने से पहले रोक दे, तो मनुष्य की स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी।
और बिना स्वतंत्रता के प्रेम, करुणा और नैतिकता का कोई अर्थ नहीं बचेगा।
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क्या दुःख हमें कुछ सिखाता है?
यह विचार थोड़ा कठिन है।
क्योंकि जब हम स्वयं पीड़ा में होते हैं, तब यह सुनना अच्छा नहीं लगता कि “दुःख हमें मजबूत बनाता है।”
लेकिन इतिहास देखें—
कई महान व्यक्तित्व अपने संघर्षों से बने।
– महात्मा गांधी
– नेल्सन मंडेला
– हेलेन केलर
यदि उनके जीवन में संघर्ष न होते, तो शायद दुनिया उन्हें उस रूप में न जानती।
इसका अर्थ यह नहीं कि दुःख अच्छा है।
बल्कि यह कि मनुष्य दुःख से भी अर्थ पैदा कर सकता है।
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भारतीय दर्शन क्या कहता है?
भारतीय चिंतन में कर्म का सिद्धांत महत्वपूर्ण है।
गीता कहती है—
«”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”»
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।
कर्म सिद्धांत के अनुसार संसार में होने वाली घटनाएँ केवल वर्तमान जीवन का परिणाम नहीं हैं।
यह दृष्टिकोण पश्चिमी दर्शन से अलग है।
हालाँकि यह भी सभी प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं देता।
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एक माँ की कहानी
एक महिला ने अपने इकलौते बेटे को दुर्घटना में खो दिया।
वह ईश्वर से नाराज़ हो गई।
मंदिर जाना छोड़ दिया।
प्रार्थना करना छोड़ दिया।
वर्षों बाद उसने अनाथ बच्चों के लिए एक विद्यालय खोला।
किसी ने पूछा—
“क्या अब आपको अपने बेटे की कमी नहीं महसूस होती?”
उसने कहा—
“कमी तो आज भी है।
लेकिन अब मैं समझती हूँ कि ईश्वर हमेशा दुःख को नहीं हटाता।
कभी-कभी वह दुःख के बीच हमें किसी बड़े उद्देश्य तक पहुँचाता है।”
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क्या हर प्रश्न का उत्तर मिलना जरूरी है?
विज्ञान हमें “कैसे” बताता है।
दर्शन हमें “क्यों” पूछना सिखाता है।
लेकिन कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनके उत्तर शायद मनुष्य की समझ से परे हों।
जैसे—
– ब्रह्मांड क्यों है?
– चेतना क्या है?
– मृत्यु के बाद क्या है?
इसी तरह बुराई का प्रश्न भी शायद ऐसा ही प्रश्न है।
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मेरी व्यक्तिगत सोच
मुझे लगता है कि Problem of Evil का सबसे ईमानदार उत्तर यह है कि हमारे पास इसका पूर्ण उत्तर नहीं है।
हम तर्क दे सकते हैं।
दर्शन कर सकते हैं।
धार्मिक व्याख्याएँ दे सकते हैं।
लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने प्रियजन को खोता है, तब उसे तर्कों से अधिक सहानुभूति की आवश्यकता होती है।
शायद ईश्वर पर विश्वास का अर्थ यह नहीं कि जीवन में दुःख नहीं होगा।
शायद उसका अर्थ यह है कि दुःख के बीच भी आशा संभव है।
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निष्कर्ष
बुराई का अस्तित्व ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध एक गंभीर चुनौती अवश्य है।
लेकिन यह ईश्वर के अस्तित्व का अंतिम खंडन नहीं है।
यह एक ऐसा प्रश्न है जो सदियों से मानवता को सोचने पर मजबूर कर रहा है।
शायद इस प्रश्न का सबसे सुंदर उत्तर किसी पुस्तक में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के जीवन में मिलता है जो अंधकार के बीच भी प्रकाश ढूँढ़ लेता है।
«”दुःख यह प्रमाण नहीं कि ईश्वर नहीं है;
कभी-कभी दुःख ही वह दर्पण होता है जिसमें मनुष्य स्वयं को सबसे स्पष्ट देख पाता है।”»



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