*”जो व्यक्ति हर उत्तर बाहर खोजता है, वह थक जाता है।
जो एक बार भीतर उतर जाता है, उसे प्रश्नों का भार ही नहीं रहता।”*
कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन महसूस होता है।
ज्ञान है, अनुभव है, लोग हैं, उपलब्धियाँ हैं—फिर भी मन किसी अनजानी तलाश में भटकता रहता है।
हम सोचते हैं कि शायद अगली सफलता, अगला रिश्ता, अगली उपलब्धि या अगली मंज़िल हमें वह शांति दे देगी जिसकी हमें तलाश है।
लेकिन क्या कभी आपने किसी वृक्ष को अपनी जड़ों की तलाश में भटकते देखा है?
नहीं।
क्योंकि वृक्ष जानता है कि उसकी शक्ति बाहर नहीं, उसकी जड़ों में है।
मनुष्य की जड़ें भी बाहर नहीं, उसके भीतर हैं।
जब तक हम अपनी पहचान केवल नाम, पद, संबंध और परिस्थितियों से जोड़कर देखते हैं, तब तक हर परिवर्तन हमें हिला देता है।
पर जिस दिन हम अपने भीतर उस मौन को छू लेते हैं जहाँ कोई तुलना नहीं, कोई भय नहीं, कोई सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं—उसी दिन जीवन बदलने लगता है।
मौन का अर्थ क्या है?
मौन केवल बोलना बंद करना नहीं है।
मौन वह अवस्था है जहाँ मन का शोर धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
जहाँ हम दूसरों को नहीं, स्वयं को सुनना शुरू करते हैं।
जहाँ विचारों की भीड़ के बीच एक स्थिर आकाश दिखाई देता है।
मौन का वृक्ष कैसे उगाएँ?
1. प्रतिदिन कुछ क्षण स्वयं के साथ बिताएँ
बिना मोबाइल, बिना संगीत, बिना किसी उद्देश्य के।
2. अपने विचारों को केवल देखें
हर विचार पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं।
3. प्रकृति के साथ समय बिताएँ
एक पेड़, एक फूल, एक पक्षी भी हमें धैर्य सिखा सकता है।
4. तुलना कम करें
हर आत्मा की यात्रा अलग होती है।
覆 मेरी अनुभूति
जब मैं लिखती हूँ, Mandala बनाती हूँ या किसी गहरे विचार पर मनन करती हूँ, तब मुझे लगता है कि जीवन का सबसे सुंदर संगीत शब्दों में नहीं, बल्कि उनके बीच के मौन में छिपा है।
शायद इसी मौन में हम स्वयं से मिलते हैं।
और शायद यही वह स्थान है जहाँ शांति जन्म लेती है।
“अपने भीतर एक मौन का वृक्ष उगाओ।
उसकी जड़ें आत्मबोध में होंगी,
उसकी शाखाएँ करुणा में,
और उसके फल शांति में।”
प्रेम, शांति और आत्मचिंतन के साथ
— Shivashri Gupta | ShreeBird ️


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